EXCLUSIVE | पर्दे के पीछे की हकीकत,एमसीबी में कानून सख़्त, पर शराब माफिया बेख़ौफ़!

एमसीबी में कानून सख़्त, पर शराब माफिया बेख़ौफ़!

वर्दी की आड़ में संरक्षण, ढाबों से सड़कों तक अवैध शराब का संगठित नेटवर्क उजागर

एमसीबी––मनेन्द्रगढ़ | एमसीबी जिले की धरती पर इन दिनों बदलाव की आहट है यह आहट सायरन की नहीं, सुरक्षा के विश्वास की है।यह शोर डंडे का नहीं, संवेदनशील नेतृत्व का है।पुलिस कप्तान श्रीमती रत्ना सिंह की तैनाती के बाद जिले की फिज़ा बदली है। चोरी, मारपीट और संगठित अपराधों पर सख़्त कार्रवाई से जहाँ अपराधियों के हौसले पस्त हुए हैं, वहीं आम नागरिकों के चेहरों पर राहत और भरोसे की मुस्कान लौट आई है।नगर के सभ्रांत नागरिक, व्यापारी वर्ग, महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग—सभी एक स्वर में कहते हैं कि
अब कानून सिर्फ़ काग़ज़ों में नहीं, ज़मीन पर दिखाई देता है।महिलाएं स्वयं को अधिक सुरक्षित महसूस कर रही हैं, बच्चे निडर होकर स्कूल जा रहे हैं और बुजुर्ग, जिनकी आंखों ने प्रशासन के कई दौर देखे हैं, आज पुलिस कप्तान की निष्ठा, ईमानदारी और मानवीय दृष्टिकोण की मिसालें देते नहीं थकते।सबसे सुंदर दृश्य तब उभरता है जब स्कूली छात्राएं पुलिस कप्तान को अपना आइडल मानती हैं।अभिभावकआपने बच्चो से कहते है
“देखो, पढ़ाई और अनुशासन से कैसी पहचान बनती है।”
युवा वर्ग, जो अक्सर भटकाव की दहलीज़ पर खड़ा दिखता है, अब नई दिशा पा रहा है—उसे यह संदेश मिल रहा है किशक्ति का सही उपयोग राष्ट्रनिर्माण में है, नशे और गलत रास्तों में नहीं।पुलिस कप्तान श्रीमती रत्ना सिंह का जनता से संवाद किसी अधिकारी का भाषण नहीं,
बल्कि एक जिम्मेदार अभिभावक की संवेदनशील बातचीत जैसा प्रतीत होता है।उनकी कार्यशैली ने यह सिद्ध कर दिया है किसख़्ती और करुणा—जब साथ चलें, तो शासन नहीं, सुशासन जन्म लेता है।
यह कोई सपना नहीं, कोई संयोग नहीं—यह दूरदर्शी सोच, अथक परिश्रम और ईमानदार नेतृत्व का प्रतिफल है।समूचा एमसीबी जिला आज यह महसूस कर रहा है कि
जब पुलिस जनता की होती है,
तो अपराध अपने आप पराजित हो जाते हैं।
लेकिन पुलिस की इस साख को बट्टा लगा रहे है कुछ कानून क़े रखवाले ही तथाकथित कानून व्यवस्था” की आड़ में एक ऐसी काली सच्चाई पनप रही है, जो पूरे सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
सूत्रों के अनुसार जिले में अवैध शराब तस्करी का संगठित नेटवर्क न सिर्फ सक्रिय है, बल्कि पुलिस की वर्दी और थाना मनेन्द्रगढ़ क़े संरक्षण की छाया में बेखौफ फल-फूल रहा है।
शराब माफिया का ‘पुष्पा मॉडल’ हाईटेक खेल, हाईप्रोफाइल संरक्षण
सूत्रों का दावा है कि अवैध शराब का यह नेटवर्क आधुनिक तकनीक और शातिर दिमाग से संचालित हो रहा है।
इस नेटवर्क का मास्टरमाइंड चनवारीडांड निवासी राकेश जायसवाल उर्फ ‘झींगा’ बताया जा रहा है।जानकारों के अनुसार—
मोबाइल फोन की लोकेशन जानबूझकर छत्तीसगढ़ में रखी जाती है जबकि स्वयं राकेश जायसवाल मध्यप्रदेश के बुढ़ार में बैठकर कारोबार संचालित करता है
व्हाट्सएप का इस्तेमाल घर पर मौजूद रिश्तेदारों के माध्यम से किया जाता है ताकि पुलिस को गुमराह आसानी से किया जा सके।
असली तस्करी अन्य मोबाइल नंबरों और व्हाट्सएप कॉलिंग से चलाई जाती हैजब भी लोकेशन ट्रेस की जाती है,तो माफिया यह साबित करने की कोशिश करता है कि वह छत्तीसगढ़ में मौजूद था।
सूत्र बताते हैं कि राकेश जायसवाल उर्फ झींगा पर पहले भी शराब तस्करी के कई गंभीर आरोप लग चुके हैं। आदतन और शातिर अपराधी होने के चलते उसने ऐसा नेटवर्क खड़ा किया है, जहां तक पहुंचना पुलिस के लिए भी आसान नहीं।
खुलेआम खप रही मध्यप्रदेश की शराब,
एमसीबी बना सेफ ज़ोन
सूत्रों के मुताबिक मध्यप्रदेश की शराब खुलेआम छत्तीसगढ़ के एमसीबी जिले में खपाई जा रही है।
इतनी सटीक प्लानिंग है कि पुलिस की संभावित कार्रवाई की खबर पहले ही माफिया तक पहुंच जाती है।
पुलिस के भीतर ‘सूत्र’! रेड से पहले खाली हो जाते हैं ठिकाने
जानकारों का आरोप है कि शराब माफिया मोटे “नज़राने” और कीमती तोहफों के जरिए पुलिस के कुछ लोगों को साध चुका है।
परिणाम साफ है—
छापे से पहले शराब ठिकानों से गायब
कार्रवाई सिर्फ कागज़ों और तस्वीरों तक सीमित
असली खिलाड़ी हर बार बच निकलते हैं
अब सवाल उठता है—
क्या माफिया पुलिस से तेज़ है, या पुलिस जानबूझकर धीमी?
ढाबों का बदला खेल — अंदर नहीं, गाड़ियों में शराब
मनेन्द्रगढ़, जहां जिले के वरिष्ठ अधिकारी निवास करते हैं, वहां सब कुछ “नियंत्रण में” दिखता है, लेकिन हकीकत बिल्कुल उलट है।
सूत्रों के अनुसार वंदना होटल, यू-टर्न ढाबा, अमर होटल, पार्क व्यू जैसे प्रतिष्ठानों ने नया तरीका अपनाया है
ढाबों में शराब नहीं परोसी जाती
ग्राहक से पहले व्हाट्सएप कॉल कराया जाता है ढाबो का कर्मचारी शराब लेकर सीधे गाड़ियों तक पहुंचते हैं।सख़्त निर्देश— “शराब गाड़ी के अंदर ही पीनी है”यहां तक कि ग्राहकों से यह भी कहा जाता है—“थाना प्रभारी और टीम हमारी सेटिंग में है, बेफिक्र रहिए।”
थाना प्रभारी पर सवाल — कार्रवाई या सिर्फ दिखावा?
स्थानीय लोगों के बीच चर्चा है कि मनेन्द्रगढ़ थाना क्षेत्र की कार्रवाई सिर्फ जनता की आंखों में धूल झोंकने तक सीमित है।
लोग दबी जुबान में पूछ रहे हैं—
अगर सब कुछ साफ है, तो माफिया बेखौफ क्यों?रेड से पहले सूचना बाहर कैसे जाती है?हर बार वही नाम क्यों सामने आते हैं?
भाजपा सरकार की छवि पर दाग लगाने की साज़िश?
प्रदेश में भाजपा सरकार सुशासन का दावा करती है।मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने विकास और प्रशासनिक सख़्ती को लेकर स्पष्ट संदेश दिया है। स्वास्थ्य मंत्री पहले ही साफ कह चुके हैं—
“कोई भी कार्यकर्ता यदि अवैध गतिविधियों में लिप्त पाया गया, तो उसे पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा।”
इसके बावजूद सूत्रों का दावा है कि मनेन्द्रगढ़ निवासी इरशाद और मित्तू रैना, एक प्रभावशाली भाजपा नेता के संरक्षण में रहकर शराब तस्करी में सक्रिय हैं।
यही वजह बताई जा रही है कि पुलिस कार्रवाई से कतराती नज़र आती है।
सबसे बड़ा सवाल
क्या ईमानदार पुलिस अधिकारियों की मेहनत पर कुछ भ्रष्ट चेहरे पानी फेर रहे हैं?
क्या राजनीतिक संरक्षण के चलते शराब माफिया कानून से ऊपर हो चुका है?
और क्या शासन-प्रशासन इस नेटवर्क की जड़ तक पहुंचने का साहस दिखाएगा?
अब निगाहें पुलिस मुख्यालय और सरकार की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं।
अगर इस पूरे नेटवर्क की निष्पक्ष और गहन जांच हुई, तो कई चौंकाने वाले नाम बेनकाब हो सकते हैं।

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